मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता

तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता

लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में
मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता

मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह
वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता

तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने
क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता

कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो
जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

— Tehzeeb Hafi

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