जख्मों ने मुझ में दरवाज़े खोले हैं
मैं ने वक़्त से पहले टांके खोलें हैं
बाहर आने की भी सकत नहीं हम में
तू ने किस मौसम में पिंजरे खोले हैं
कौन हमारी प्यास पे डाका डाल गया
किस ने मस्कीजो के तस
में खोले हैं
यूँ तो मुझ को कितने ख़त मोसुल हुए
एक दो ऐसे थे जो दिल से खोलें हैं
ये मेरा पहला रमजान था उस के बगैर
मत पूछो किस मुँह से रोज़े खोलें हैं
वरना धूप का पर्वत किस से कटता था
उस ने छतरी खोल के रास्ते खोले हैं
— Tehzeeb Hafi















