शुआ-ए-मेहर की शबनम से बन नहीं सकती
ग़म-ए-जहाँ की तिरे ग़म से बन नहीं सकती
ये फ़ैसला है हमारा तिरे लिए सय्याद
चमन में रह के तिरी हम से बन नहीं सकती
हयात-ए-जहद-ओ-अमल से है वर्ना मौत अच्छी
हयात-ए-गिर्या-ए-मातम से बन नहीं सकती
हज़ार कुछ हो मगर ज़ाहिदों की जन्नत में
ये तज्रबा है कि आदम से बन नहीं सकती
— Taj Bhopali















