दिल को कोई आज़ार तो होता
अपना कोई ग़म-ख़्वार तो होता
सहरा भी कर लेते गवारा
ज़िक्र-ए-दर-ओ-दीवार तो होता
साया-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार नहीं था
साया-ए-याद-ए-यार तो होता
आँखों से कुछ ख़ून ही बहता
वो दामन गुल-कार तो होता
लाख तुलू-ए-मेहर थे लेकिन
कोई शब-बेदार तो होता
— Taj Bhopali















