ग़म इस का कुछ नहीं है कि मैं काम आ गया

ग़म ये है क़ातिलों में तिरा नाम आ गया

जुगनू जले बुझे मिरी पलकों पे सुब्ह तक
जब भी तिरा ख़याल सर-ए-शाम आ गया

महसूस कर रहा हूँ मैं ख़ुशबू की बाज़गश्त
शायद तिरे लबों पे मिरा नाम आ गया

कुछ दोस्तों ने पूछा बताओ ग़ज़ल है क्या
बे-साख़्ता लबों पे तिरा नाम आ गया

मैं ने तो एक लाश की दी थी ख़बर 'फ़राज़'
उल्टा मुझी पे क़त्ल का इल्ज़ाम आ गया

— Tahir Faraz

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