ये कज-अदाई ये ग़म्ज़ा तिरा कभी फिर यार!

कि तेरा शहर नया और मैं मुसाफ़िर यार!

तू और कुछ न सही, दोस्त तो है आख़िर यार!
दुखी रहा है बहुत आज तेरा शाइ'र यार!

कहाँ का लम्स, कहाँ की हवस, कहाँ का विसाल
तड़प रहा हूँ तिरी हमदमी की ख़ातिर यार!

सँभल भी जाता था दिल तेरे हिज्र में, या'नी
रहा हूँ मैं भी तिरी आरज़ू का मुंकिर यार!

पुकारती हैं मुझे घंटियाँ तिरी ऐसे
कि जैसा तेरा मदीना हो कोई मंदिर यार!

— Syed Kashif Raza

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