ज़मीं दुबारा बने और ख़ुदा का नाम न हो
के 'कुन' के बा'द फिर उस से दुआ सलाम न हो
भटकता फिरता हूँ बेघर जो इन दिनों हर शाम
ये इक उदास परिंदे का इंतिक़ाम न हो
ये क्या कि एक ज़रा ख़ुद-कुशी का दिल जो करे
तो घर में मौत का थोड़ा भी इंतेज़ाम न हो
— Swapnil Tiwari















