कोई दरवाज़ा मिलेगा अब न ही खिड़की मिलेगी

नफ़रतों के दौर में हर एक शय ऐसी मिलेगी

कुछ नहीं है ये मोहब्बत कहने वालों सोच लो ये
तुम को भी इक रोज़ ख़्वाबों में कोई लड़की मिलेगी

बस तेरा साया ही हूँ मैं इस से ज़्यादा कुछ नहीं हूँ
वैसे भी सागर किनारे थोड़ी तो मिट्टी मिलेगी

तालियों की गड़गड़ाहट में कहाँ जादूगरी है
जान जाओगे ये जब तुम से भी ख़ामोशी मिलेगी

बद-दुआ है या दुआ ये तो नहीं मालूम लेकिन
तेरी औलादों को महबूबा तेरे जैसी मिलेगी

राएगानी के अगर मानी समझने हैं तो आना
बा'द तेरे तुझ को हर इक शय यहाँ उजड़ी मिलेगी

— Subhash Ehsaas

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