"तख़लीक़"

वो मुझ से कहती थी
मेरे शाइ'र
ग़ज़ल सुनाओ
जो अनसुनी हो
जो अनकही हो
कि जिस के एहसास
अनछुए हों,

हों शे'र ऐसे
कि पहले मिसरे को
सुन के
मन में
खिले तजस्सुस
का फूल ऐसा
मिसाल जिस की
अदब में सारे
कहीं भी ना हो....

मैं उस से कहता था
मेरी जानाँ
ग़ज़ल तो कोई ये कह चुका है,
ये मोजज़ा तो
ख़ुदा ने मेरे,
दुआ से
पहले ही कर दिया है,

तमाम आलम की
सब से प्यारी
जो अनकही सी
जो अनसुनी सी
जो अनछुई सी
हसीं ग़ज़ल है--

'वो मेरे पहलू में
जलवागर है...

— Siraj Faisal Khan

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