बैठ कर हम उसे बस निहारा किए

ज़िन्दगी इस क़दर हम गुज़ारा किए

रेत पर नाम लिख के हज़ारों दफ़ा
बारहा उस को ही हम पुकारा किए

जब भी देखा उसे ग़ौर से देर तक
अपनी नज़रों से नज़रें उतारा किए

देख कर आप को कुछ न देखा कभी
उम्र भर आप का ही नज़ारा किए

हाथ थामा न हम ने किसी ग़ैर का
एक बस आप को ही सहारा किए

हम ने अहल-ए-ख़िरद की न मानी कभी
देखते ही हम इनसे किनारा किए

क़ैद कर के उसे अपनी बाहों में, फिर
रात भर उस की ज़ुल्फ़ें सँवारा किए

हम ने बदला नहीं ये तुफ़ैल-ए-सुकूँ
हम उन्हीं से मुहब्बत दुबारा किए

— Aman Kumar Shaw "Haif"

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