सोचता हूँ कि वो कितने मा'सूम थे क्या से क्या हो गए देखते-देखते

मैं ने पत्थर से जिन को बनाया सनम वो ख़ुदा हो गए देखते-देखते

हश्र है वहशत-ए-दिल की आवारगी हम से पूछो मोहब्बत की दीवानगी
जो पता पूछते थे किसी का कभी लापता हो गए देखते-देखते

हम से ये सोच कर कोई वा'दे करो एक वा'दा पे 'उम्रें गुज़र जाएँगी
ये है दुनिया यहाँ कितने अहल-ए-वफ़ा बे-वफ़ा हो गए देखते-देखते

ग़ैर की बात तस्लीम क्या कीजिए अब तो ख़ुद पर भी हम को भरोसा नहीं
अपना साया समझते थे जिन को कभी वो जुदा हो गए देखते-देखते

— Shakeb Jalali

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