कुछ देर काली रात के पहलू में लेट के

लाया हूँ अपने हाथों में जुगनू समेट के

दो चार दाँव खेल के वो सर्द पड़ गया
अब क्या करोगे ताश के पत्तों को फेट के

उस साँवले से जिस्म को देखा ही था कि बस
घुलने लगे ज़बाँ पे मज़े चाकलेट के

जैसे कोई लिबास न हो उस के जिस्म पर
यूँ रास्ता चले है बदन को समेट के

मैं उस के इंतिज़ार में बैठा ही रह गया
कपड़ों में रख गया वो बदन को लपेट के

हर फ़लसफ़े को वक़्त ने ऐसे मिटा दिया
जैसे कोई नुक़ूश मिटा दे सलेट के

वो हँस रहा था दूर खड़ा और चंद लोग
ले जा रहे थे उस को कफ़न में लपेट के

— Shahid Kabir

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