मुझ से आगे नज़र आने में ख़ुशी थी उस की
मेरी ज़ंजीर से ज़ंजीर बड़ी थी उस की
बात से बात निकल आती थी और हाथ से हाथ
वो था हमराह मेरा और कमी थी उस की
एक छत के तले फिर बात कहाँ तक चलती
मेरी ख़ामोशी पुरानी थी नई थी उस की
इंहिदाम आए हैं जो देख के देख आए हैं क्या
मेरी तस्वीर पे तस्वीर गिरी थी उस की
उस ने क्या क्या न मेरे पानियों के छीटें उड़ाएँ
भरते भरते ही कहीं ओक भरी थी उस की
जब अँधेरे में अँधेरे की तरह थे सब लोग
रौशनी याद है किस किस पे पड़ी थी उस की
इक रिवायत थी कि इस शहर में इक शख़्स है कम
उस ने साबित किया आ कर ये कमी थी उस की
— Shaheen Abbas















