मौजा-ए-ख़ून-ए-परेशान कहाँ जाता है
मुझ से आगे मेरा तूफ़ान कहाँ जाता है
चाय की प्याली में तस्वीर वही है कि जो थी
यूँ चले जाने से मेहमान कहाँ जाता है
मैं तो जाता हूँ बयाबान-ए-नज़र के उस पार
मेरे हम-राह बयाबान कहाँ जाता है
तेरी ख़ुशबू को लुटाते हुए आते जाते
बाक़ी बचता है जो इंसान कहाँ जाता है
बात यूँ ही तो नहीं करता हूँ मैं रुक रुक कर
क्या बताऊँ कि मेरा ध्यान कहाँ जाता है
आज मैं पहली दफ़ा साथ नहीं पीछे हूँ
देखता हूँ मेरा सामान कहाँ जाता है
घर बदलना तो बहाना है बहाना कर के
अंदर अंदर ही से इंसान कहाँ जाता है
कुछ बता तो सही ऐ ध्यान से जाते हुए शख़्स
तू चला जाए तो फिर ध्यान कहाँ जाता है
दास्ताँ-गो की निशानी कोई रक्खी है कि वो
दास्ताँ-गोई के दौरान कहाँ जाता है
रंग-ओ-रोग़न से तो लगता है मुसव्विर है वही
आज फिर इतना परेशान कहाँ जाता है
अब तो दरिया में बंधे बैठे हैं दरिया की तरह
अब किनारों की तरफ़ ध्यान कहाँ जाता है















