ये कौन है जो ख़्वाब में मुझे सिखा रही ग़ज़ल
मुझे नहीं पता कहाँ कहाँ से आ रही ग़ज़ल
जफ़ा समेटते हुए मैं जब कभी बिखर गया
तो हर्फ़ हर्फ़ जोड़कर मुझे बना रही ग़ज़ल
सुनो तुम्हारी बातों में नशा नशा सा लग रहा
तुम्हारे इन लबों पे जैसे मुस्कुरा रही ग़ज़ल
कहाँ चली मता-ए-जाँ कि रुक ज़रा सा सब्र कर
ये तेरी ख़ूबियाँ ही तो तुझे बता रही ग़ज़ल
ये पहले हम ही शाइरों के रास्तों पे चल पड़ी
पर अब ये अपनी राह ख़ुद हमें चला रही ग़ज़ल
ज़बान की जहान में ये रेख़्ता सितारे हैं
फिर इन सितारों के जहाँ में जगमगा रही ग़ज़ल
बड़ी ही पुर कशिश सदा रवाँ है उस से जा-बजा
कि "लहजा-ए-शगफ़" में जब वो गुनगुना रही ग़ज़ल















