कभी इस की क़सम खाओ कभी उस की क़सम खाओ

नहीं तुम झूठ कहते हो चलो मेरी क़सम खाओ

वफ़ा को मापने का इक अलग उस का है पैमाना
तुम्हें मुझ से मुहब्बत है अगर सच्ची,क़सम खाओ

उसे विश्वास ही होता नहीं चाहे मैं जो कह लूँ
क़सम खाओ अगर बोला है तो जल्दी क़सम खाओ

मुझे मालूम है तुम कल किसी के साथ थे फिर से
अगर ऐसा नहीं है तो मिरे सर की क़सम खाओ

किसी भी झूठ को तुम सच बना सकते नहीं,चाहे
किसी पोथी पे रख के हाथ जो मर्ज़ी क़सम खाओ

ये कलयुग है मिरे प्यारे यहाँ सब कुछ ही चलता है
यहाँ कोई नहीं मरता कि तुम झूटी क़सम खाओ

— Sarvjeet Singh

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