कितना ख़ुश-रंग तेरा लहजा है
जो तेरी आँख से छलकता है
मैं तो ये जान कर परेशां हूँ
मेरी ख़ातिर कोई सँवरता है
उस का ख़त इक किताब में है उधर
और इधर घर का घर महकता है
इतना आसान तो नहीं हूँ मैं
जितना आसान तू समझता है
तू ने कह तो दिया मुझे पत्थर
मेरे सीने में दिल धड़कता है
— Santosh S Singh















