कुछ इस लिए भी मुझे आइना पसंद नहीं

मैं साफ़-गोई में भी इंतिहा-पसंद नहीं

तमाम उम्र पड़ाव पे काटनी होगी
सफ़र का शौक़ है और रास्ता पसंद नहीं

तुम्हारे सामने सच बोलने से रुक गए हैं
हमें बताओ तुम्हें और क्या पसंद नहीं

ये और बात कि दिल में जगह न देंगे उसे
मगर वो शख़्स हमें अब भी ना-पसंद नहीं

मेरा ख़ुलूस कि उस की जगह पे कट रहा हूँ
वो शाख़ जिस को मेरा घोंसला पसंद नहीं

— Sanaullah Zaheer

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