ख़ुद में उतरे और तुग़्यानी से बाहर आ गए
आ के गहराई में हम पानी से बाहर आ गए
उस की रौनक़ में बहुत सुनसान से लगते थे हम
शहर से निकले तो वीरानी से बाहर आ गए
लफ़्ज़ वो जिन को ज़बाँ तक लाने की हिम्मत न थी
आख़िर इक दिन मेरी पेशानी से बाहर आ गए
दम-ब-ख़ुद उस हुस्न को ही देखते रहते थे हम
यूँ बरत टूटा कि हैरानी से बाहर आ गए
आस्तीं में पल रहे थे लेकिन इक दिन यूँ हुआ
साँप आपस की परेशानी से बाहर आ गए
वो तअल्लुक़ हम को क़ैद-ए-ख़्वाब जैसा था 'ज़हीर'
खुल गईं आँखें तो आसानी से बाहर आ गए
— Sanaullah Zaheer















