अपनी मस्ती कि तेरे क़ुर्ब की सरशारी में

अब मैं कुछ और भी आसान हूँ दुश्वारी में

कितनी ज़रख़ेज़ है नफ़रत के लिए दिल की ज़मीं
वक़्त लगता ही नहीं फ़स्ल की तैयारी में

इक तअल्लुक़ को बिखरने से बचाने के लिए
मेरे दिन रात गुज़रते हैं अदाकारी में

ऐ ज़माने में तिरे अश्क भी रो लूँगा मगर
अभी मसरूफ़ हूँ ख़ुद अपनी अज़ा-दारी में

वो किसी और दवा से मेरा करता है इलाज
मुब्तला हूँ मैं किसी और ही बीमारी में

उस के कमरे से उठा लाया हूँ यादें अपनी
ख़ुद पड़ा रह गया लेकिन किसी अलमारी में

अपनी तामीर उठाते तो कोई बात भी थी
तुम ने इक उम्र गँवा दी मेरी मिस्मारी में

— Sanaullah Zaheer

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