वफ़ादारी सभी करते नहीं हैं

सभी कंधों पे सर धरते नहीं हैं

विसाले यार की ख़्वाहिश थी जिन को
फ़िराक़े यार में मरते नहीं हैं

कभी अग़्यार की महफ़िल में देखो
हमारा ज़िक्र वो करते नहीं हैं

कुछ ऐसे ज़ख़्म सीने में दबे हैं
उभरते हैं मगर भरते नहीं हैं

हमारे सिर पे साया है ख़ुदा का
किसी काफ़िर से हम डरते नहीं हैं

नबी-ए-पाक पर जो जाँ लुटा दें
वो मर कर भी कभी मरते नहीं हैं

ये रब की मस्लिहत बस रब ही जाने
सना उस पर शुबा करते नहीं हैं

— Sana Hashmi

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