हम दर-ब-दर की ठोकरें खाते चले गए
फिर भी तराने प्यार के गाते चले गए
कोशिश तो की भँवर ने डुबोने की बारहा
हम कश्ती-ए-हयात बचाते चले गए
अपना कहा किसी ने गले से लगा लिया
यूँ दुश्मनों को दोस्त बनाते चले गए
रुसवाइयों के डर से कभी बज़्म-ए-नाज़ में
हँस-हँस के दर्द-ए-दिल को छुपाते चले गए
करता है जो सभी के मुक़द्दर का फ़ैसला
उस की रज़ा की शम्अ' जलाते चले गए
— SALIM RAZA REWA















