रातों का तसव्वुर है उन का और चुपके-चुपके रोना है

ऐ सुब्ह के तारे तू ही बता अन्जाम मिरा क्या होना है

इन नौ-रस आँखों वालों का क्या हँसना है, क्या रोना है
बरसे हुए सच्चे मोती हैं बहता हुआ ख़ालिस सोना है

दिल को खोया ख़ुद भी खोए, दुनिया खोई, दीन भी खोया
ये गुम-शुदगी है तो इक दिन ऐ दोस्त तुझे भी खोना है

तमईज़-ए-कमाल-ओ-नक्स उठा ये तो रौशन है दुनिया पर
मैं चन्दन हूँ तू कुन्दन है मैं मिट्टी हूंतू सोना है

तू ये न समझ लिल्लाह कि है तस्कीन तिरे दीवानों को
वहशत में हमारा हंसपड़ना दर-अस्ल हमारा रोना है

मातम है मेरी आवाज़ शिकस्त-ए-साज-ए-दिल-ए-सद-पारा का
’सागर’ मेरा नग़्मा भी दीपक के सुरों में रोना है

— Saghar Nizami

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