ये शोर कश्मकश ये हंगाम कुछ नहीं है
ये ताम-झाम साक़ी ये शाम कुछ नहीं है
तुम से कोई शिकायत मैं क्यूँ करूँ भला जब
मैं जानता हूँ इस का अंजाम कुछ नहीं है
हर एक शय में वो ही ख़ुद साँस ले रहा है
हर चीज़ याँ की अदभुत याँ आम कुछ नहीं है
सब अपनी जेब भरने के इंतिज़ाम में हैं
इन के लिए वतन औ' आवाम कुछ नहीं है
इन सब के बा'द मुझ को मरना भी होगा क्या अब
या'नी कि इस जतन का अंजाम कुछ नहीं है
अच्छा ये नज़्में ग़ज़लें तो ठीक हैं चलो पर
कुछ काम वाम भी या जी काम कुछ नहीं है
— Sagar Kaushik















