ग़लत को फ़र्ज़ कहते हैं ख़ुदा के नाम पर 'सागर'

ख़ुदा से दूर भागे हैं ख़ुदा के नाम पर 'सागर'

ख़ुदा भी मुस्कुराता है फ़रिश्ते खिलखिलाते हैं
यहाँ क्या-क्या तमाशे हैं ख़ुदा के नाम पर 'सागर'

मुयस्सर है नहीं दो वक़्त की रोटी भी जिन को अब
वही परचम उठाए हैं ख़ुदा के नाम पर 'सागर'

ख़ुदा को भी ख़बर है क्या कि तुम इतने सियाने हो
जो तुम ने शौक़ पाले हैं ख़ुदा के नाम पर 'सागर'

निठल्ले शोर करते हैं ख़ुदा के नाम पर 'सागर'
ख़ुदा चुप्पी सॅंभाले हैं ख़ुदा के नाम पर 'सागर'

— Sagar Kaushik

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