Safar
Safar
Ghazal

सूरज ऐसा उगा के अँधेरा हुआ

चाँद कहने लगा अब के अच्छा हुआ

अपनी ही मस्ती में मस्त उड़ता हुआ
कितना लम्बा लगूंगा मैं लटका हुआ

चाँद से क़ल्ब में खलबली मच गई
ख़ुश्क पत्ता जो गुज़रा घिसटता हुआ

लीजिए पूजिए अब से इस शक्ल को
पेश है एक चेहरा मिटाया हुआ

सैकड़ों बार इस के मुताबिक़ चला
तब कहीं जाके ये रस्ता सीधा हुआ

शाख़ से बेल लिपटी रही रात भर
अब मैं क्या क्या बताऊँ के क्या क्या हुआ

— Safar

More by Safar

Other ghazal from the same pen

See all from Safar →

Chehra Shayari

Shers of chehra.

All Chehra Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling