Safar
Safar
Ghazal

क़सम ख़ुदा की लगे है ऐसा तुम्हारा आना तुम्हारा जाना

फ़क़त हो जैसे गुमाँ हमारा तुम्हारा आना तुम्हारा जाना

सनम ने पूछा बताओ जल्दी हयात क्या है ममात क्या है
बिला-तक़ल्लुफ़ ज़बाँ से निकला तुम्हारा आना तुम्हारा जाना

कोई तुम्हारी निगह में उलझा किसी को भाए तुम्हारे गेसू
मगर मुझे बस पसंद आया तुम्हारा आना तुम्हारा जाना

जो शख़्स तुम से ये कह रहा है यहाँ प बैठो क़रीब आ कर
कभी न कहता जो देख लेता तुम्हारा आना तुम्हारा जाना

— Safar

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Nazar Shayari

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