देखिए कौन है बराबर में
मख़्फ़ी होती है आस भी डर में
एक आवाज़ आई टिक टिक की
वक़्त बदला हुआ था पल भर में
कैसी दिखती है रूह बोलो ना
क्या छुपाया है हम से पैकर में
हुस्न-ए-जानाँ से गर मिली फ़ुर्सत
हश्र देखेंगे अपना महशर में
टूट कर डाल से ये इल्म हुआ
बिन मेरे काम का था सब घर में
उड़ते फिरते हैं छत से टकराते
अब खिंचाव नहीं है बिस्तर में
— Safar















