झूट से सच को कोई रिहाई नहीं
छत के नीचे से दीवार हटती नहीं
दौड़ती भागती ज़िन्दगी से परे
इक घड़ी और है जो कि चलती नहीं
इतनी वहशत हुई एक आवाज़ से
कुछ नहीं चाहिए अब हवा भी नहीं
फिर ये आवारगी रंग-ए-दिल खा गई
हर दफ़अ' तितलियां हों ज़रूरी नहीं
आइए देखिए शक्ल दीवार में
आईने तोड़ कर शर्म आती नहीं
हुस्न-ए-शब पर है लाज़िम चराग़-ए-सहर
उम्र भर कोई क़िन्दील जलती नहीं
— Safar















