Safar
Safar
Ghazal

झूट से सच को कोई रिहाई नहीं

छत के नीचे से दीवार हटती नहीं

दौड़ती भागती ज़िन्दगी से परे
इक घड़ी और है जो कि चलती नहीं

इतनी वहशत हुई एक आवाज़ से
कुछ नहीं चाहिए अब हवा भी नहीं

फिर ये आवारगी रंग-ए-दिल खा गई
हर दफ़अ' तितलियां हों ज़रूरी नहीं

आइए देखिए शक्ल दीवार में
आईने तोड़ कर शर्म आती नहीं

हुस्न-ए-शब पर है लाज़िम चराग़-ए-सहर
उम्र भर कोई क़िन्दील जलती नहीं

— Safar

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