वो क्यूँँ न रूठता मैं ने भी तो ख़ता की थी

बहुत ख़याल रखा था बहुत वफ़ा की थी

सुना है इन दिनों हम-रंग हैं बहार और आग
ये आग फूल हो मैं ने बहुत दुआ की थी

नहीं था क़ुर्ब में भी कुछ मगर ये दिल मिरा दिल
मुझे न छोड़ बहुत मैं न इल्तिजा की थी

सफ़र में कश्मकश-ए-मर्ग-ओ-ज़ीस्त के दौरान
न जाने किस ने मुझे ज़िंदगी अता की थी

समझ सका न कोई भी मिरी ज़रूरत को
ये और बात कि इक ख़ल्क़ इश्तिराकी थी

ये इब्तिदा थी कि मैं ने उसे पुकारा था
वो आ गया था 'ज़फ़र' उस ने इंतिहा की थी

— Sabir Zafar

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