यगाना बन के हो जाए वो बेगाना तो क्या होगा

जो पहचाना तो क्या होगा न पहचाना तो क्या होगा

किसी को क्या ख़बर आँसू हैं क्यूँ चश्म-ए-मोहब्बत में
फ़ुग़ाँ से गूँज उट्ठेगा जो वीराना तो क्या होगा

हमारी सी मोहब्बत तुम को हम से हो तो क्या गुज़रे
बना दे शम्अ'' को भी इश्क़ परवाना तो क्या होगा

यही होगा कि दुनिया अक़्ल का अंजाम देखेगी
हद-ए-वहशत से बढ़ जाएगा दीवाना तो क्या होगा

तअस्सुब दरमियाँ से आप को वापस न ले आए
हरम की राह में निकला सनम-ख़ाना तो क्या होगा

तसव्वुर कीजिए उस आने वाले दौर-ए-बरहम का
गदा तोड़ेंगे जब पिंदार-ए-शाहाना तो क्या होगा

मिटा दो हसरत-ए-आबादी-ए-दिल भी मिरे दिल से
ये जितना अब है इस से और वीराना तो क्या होगा

न तुम आओगे न आवाज़ अपनी लौट पाएगी
पुकारेगा तुम्हें सहरा में दीवाना तो क्या होगा

फ़रेब-ए-ज़िंदगी की दास्ताँ कहने को क्या कम है
क़यामत में ज़बाँ पर और अफ़्साना तो क्या होगा

लहू के दाग़ बढ़ जाएँगे कुछ दीवार-ए-ज़िंदाँ पर
ख़फ़ा हो जाएगा ज़िंदाँ से दीवाना तो क्या होगा

मुदावा हो नहीं सकता है दिल पर चोट खाने का
मिरे क़दमों पे रख दो ताज-ए-शाहाना तो क्या होगा

'सबा' जो ज़िंदगी भीगी हुई है बारिश-ए-गुल से
बुलाएगा किसी दिन उस को वीराना तो क्या होगा

— Saba Akbarabadi

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