जुनूँ में गुम हुए होश्यार हो कर

हमें नींद आ गई बेदार हो कर

मता-ए-अस्ल हाथों से गँवा दी
ख़राब-ए-अंदक-ओ-बिसयार हो कर

हमीं ने की थी सैक़ल इस नज़र पर
हमीं पर गिर पड़ी तलवार हो कर

जो ग़ुंचा सो रहा था शाख़-ए-गुल पर
परेशाँ हो गया बेदार हो कर

दुर-ए-मक़सूद बस इक दो क़दम था
कि रिश्ता रह गया दीवार हो कर

न आए होश में दीवाना कोई
बहुत दुख पाएगा होश्यार हो कर

'सबा' मय है न साक़ी है न साग़र
ये दिन भी देखिए मय-ख़्वार हो कर

— Saba Akbarabadi

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