दहकने लग गए रुख़सार-औ-लब चराग़ के साथ

तो मैं ने ताक में भर डाली शब चराग़ के साथ

तुम्हारे साथ मुझे देख कर कहेंगे लोग
हवा की दोस्ती ऐसे ग़ज़ब चराग़ के साथ

मैं उस की रौशनी पूरे नगर में बांटूँगी
मेरा मुआमला ऐसा है अब चराग़ के साथ

नहीं ऐ दोस्त अँधेरा हमें भी रास न था
हमारी दुश्मनी होती थी तब चराग़ के साथ

हमारी आँख बुझा दो मगर ख़याल रहे
जलेंगे ख़्वाब तुम्हारे भी सब चराग़ के साथ

— Ruqayyah Maalik

More by Ruqayyah Maalik

Other ghazal from the same pen

See all from Ruqayyah Maalik →

Dost Shayari

Shers of dost.

All Dost Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling