बे-मौत जान लेगा ये जितना अजीब है
दुख जिस क़दर शदीद है उतना अजीब है
कोई गली कहीं नहीं राह-ए-फ़रार की
या रब तेरे ज़हान का नक़्शा अजीब है
उस दिल में बस रहे है कई लोग एक साथ
हर आदमी का चाँद पे जाना अजीब है
इक तो वो दिल दुखाता है दिन में हज़ार बार
ऊपर से ख़ुश भी रहता है कितना अजीब है
ऐ शख़्स काइनात में वो सब तुम्हारे नाम
जो कुछ जहाँ कहीं पे भी जितना अजीब है
— Ruqayyah Maalik















