आँखों में किसी याद का रस घोल रही हूँ
उलझे हुए पल्लू से गिरह खोल रही हूँ
वो आए ख़रीदे मुझे पिंजरे में बिठा दे
मैं बाग़ में मीना की तरह बोल रही हूँ
हर बार हुआ है मेरे नुक़सान का सौदा
कहने को हमेशा से मैं अनमोल रही हूँ
— Rehana Qamar
उलझे हुए पल्लू से गिरह खोल रही हूँ
वो आए ख़रीदे मुझे पिंजरे में बिठा दे
मैं बाग़ में मीना की तरह बोल रही हूँ
हर बार हुआ है मेरे नुक़सान का सौदा
कहने को हमेशा से मैं अनमोल रही हूँ
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