तेरी नाज़ुकी बदन की कोई पंखुड़ी हो जैसे

तू महक रही है ऐसे कली संदली हो जैसे

तू जो मुझ से रूठ जाए तो लगे है मुझ को ऐसे
मेरी ज़िंदगी में आई कोई खलबली हो जैसे

तेरी याद की कफ़स से कभी जो निकलना चाहा
मैं समाता जाऊँ इस
में ज़मीं दलदली हो जैसे

तू जो साथ मेरे थी तो थी अमीरी साथ मेरे
तुझे खो के यूँ लगा है मिली मुफ़्लिसी हो जैसे

तेरा रूप है सलोना तेरा हुश्न है क़यामत
तेरे होंठ शबनमी हैं नई ताज़गी हो जैसे

मैं नहीं ये चाहता हूँ तुझे और कोई चाहे
तुझे चाहता हूँ ऐसे कोई मतलबी हो जैसे

तेरी ओर खींचता है मुझे जाने कैसा जादू
तुझे पूजता 'मलक' यूँ कोई बंदगी हो जैसे

— Ram Singar Malak

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