तभी वो बहस में जीती हुई है

कि बस उस ने वकालत की हुई है

सही है मशवरा पर आप रखिए
कलाई आपने काटी हुई है

बदलना तो मुझे बस वक़्त को है
घड़ी तो ठीक से पहनी हुई है

न बंजर देखी जाती है न ज़रख़ेज़
ये जो हम ने ज़मीं छोड़ी हुई है

मिटेंगी दूरियाँ कैसे कि हम ने
ग़लत-फ़हमी भी तो पाली हुई है

वो जो भी राय है नाकाम की इक
वही हम ने नहीं मानी हुई है

बस इक सूरत है ले दे के मेरे पास
ये भी माँ ने मुझे बख़्शी हुई है

— Rajnishwar Chauhan 'Rajnish'

More by Rajnishwar Chauhan 'Rajnish'

Other ghazal from the same pen

See all from Rajnishwar Chauhan 'Rajnish' →

Maa Shayari

Shers of maa.

All Maa Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling