जब से उस ने बोल दिया मैं सहरा हूँ
बाज़ू सौंप के घुटने टेक के बैठा हूँ
मेरे यार के सर जंगल का साया है
और मैं एक लकड़हारे का बेटा हूँ
तेरे प्यार में यूँ कटते हैं दिन और रात
रस्सी छोड़ के इक तलवार पे चलता हूँ
दीवाने तो लौट गए क़िस्से देकर
मुझ को तो जीना होगा मैं लिखता हूँ
तुम इक दिन चुपके से दाख़िल हो जाना
मैं इक दर हूँ और धी
में से खुलता हूँ
— Rajnishwar Chauhan 'Rajnish'















