इक मुक़द्दर छीनने वाले का जल्वा देखता

मैं हवा से जेब तक जाता वो सिक्का देखता

ज़िन्दगी तू नक़्ल की मोहलत अगर देती मुझे
मैं कसौटी पे तेरी धोखे का पर्चा देखता

कुछ दिनों तक कोई पागल बैठता था दार पे
जो हज़ारों मर्तबा सुनसान रस्ता देखता

मैं उसे हर बार मेहमाँ बोलता था और वो
मेज़बानी देखता था और कमरा देखता

आसमाँ पे चाँद उस शब आ गया था बा'द में
यार तू वो आख़िरी बादल तो छँटता देखता

— Rajnishwar Chauhan 'Rajnish'

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