क़दम ज़मीं पे न थे राह हम बदलते क्या
हवा बँधी थी यहाँ पीठ पर सँभलते क्या
फिर उस के हाथों हमें अपना क़त्ल भी था क़ुबूल
कि आ चुके थे क़रीब इतने बच निकलते क्या
यही समझ के वहाँ से मैं हो लिया रुख़्सत
वो चलते साथ मगर दूर तक तो चलते क्या
तमाम शहर था इक मोम का 'अजाइब घर
चढ़ा जो दिन तो ये मंज़र न फिर पिघलते क्या
वो आसमाँ थे कि आँखें समेटती कैसे
वो ख़्वाब थे कि मेरी ज़िंदगी में ढलते क्या
निबाहने की उसे भी थी आरज़ू तो बहुत
हवा ही तेज़ थी इतनी चराग़ जलते क्या
उठे और उठ के उसे जा सुनाया दुख अपना
कि सारी रात पड़े करवटें बदलते क्या
न आबरू-ए-त'अल्लुक़ ही जब रही 'बानी'
बग़ैर बात किए हम वहाँ से टलते क्या















