जो ज़हर है मेरे अंदर वो देखना चाहूँ

अजब नहीं मैं तेरा भी कभी बुरा चाहूँ

मैं अपने पीछे अजब गर्द छोड़ आया हूँ
मुझे भी रह न मिलेगी जो लौटना चाहूँ

वो इक इशारा-ए-ज़ेरीं हज़ार ख़ूब सही
मैं अब सदा के सिले में कोई सदा चाहूँ

मेरे हुरूफ़ के आईने में न देख मुझे
मैं अपनी बात का मफ़्हूम दूसरा चाहूँ

खुली है दिल पे कुछ इस तरह ग़म की बे-सबबी
तेरी ख़बर न कुछ अपना ही अब पता चाहूँ

कोई पहाड़ न दरिया न आग रस्ते में
अजब सपाट सफ़र है कि हादसा चाहूँ

न चाहूँ दूर से आती हुई कोई आवाज़
न अपने साथ में अपनी सदा-ए-पा चाहूँ

न चाहूँ सामने अपने कोई अक्स-ए-सफ़र
न सर पे राह दिखाती हुई हवा चाहूँ

वो लाए तो किसी रंजिश को दरमियाँ 'बानी'
मैं बात करने को थोड़ा सा फ़ासला चाहूँ

— Rajinder Manchanda Bani

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