जब छाए कहीं सावन की घटा, रो-रो के न करना याद मुझे
ऐ जाने तमन्ना ग़म तेरा, कर न दे कहीं बर्बाद मुझे
जो मस्त बहारें आई थीं, वो रूठ गईं उस गुलशन से
जिस गुलशन में दो दिन के लिए, क़िस्मत ने किया आज़ाद मुझे
वो राही हूँ पलभर के लिए, जो ज़ुल्फ़ के साए में ठहरा
अब ले के चल दूर कहीं, ऐ इश्क़ मेरे बेदाग मुझे
ऐ याद-ए-सनम अब लौट भी जा, तू आ गई क्यूँ समझाने को
मुझ को मेरा ग़म शात है, तू और न कर नौशात मुझे
— Raja Mehdi Ali Khan















