हिर्स के बाब में यूँँ ख़ुद को तुम्हारा कर के

हाथ मलता हूँ मैं अपना ही ख़सारा कर के

अब मिरे ज़ेहन में बस लज़्ज़त-ए-दुनिया है रवाँ
थक चुका हूँ तिरी उल्फ़त पे गुज़ारा कर के

हम अभी सोहबत-ए-दुनिया में हैं मसरूफ़ मगर
कोई शब तुम को भी देखेंगे गवारा कर के

हम से ख़ामोश तबीअत भी हैं दुनिया में कि जो
उस को ही चाहते हैं उस से किनारा कर के

देर तक कोई न था राह बताने वाला
और फिर ले गई इक मौज इशारा कर के

— Rahul Jha

More by Rahul Jha

Other ghazal from the same pen

See all from Rahul Jha →

Sarhad Shayari

Shers of sarhad.

All Sarhad Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling