रास्ते में फिर वही पैरों का चक्कर आ गया
जनवरी गुज़रा नहीं था और दिसंबर आ गया
ये शरारत है, सियासत है, के है साज़िश कोई
शाख़ पर फल आएँ इस से पहले पत्थर आ गया
मैं ने कुछ पानी बचा रखा था अपनी आँख में
एक समुंदर अपने सूखे होंठ ले कर आ गया
अपने दरवाज़े पे मैं ने पहले ख़ुद आवाज़ दी
और फिर कुछ देर में ख़ुद ही निकल कर आ गया
मैं ने बस्ती में कदम रखा तो यूँ लगा
जैसे जंगल मेरे पैरो से लिपट कर आ गया
पाँव के ठोकर में जिस के तेरे तख़्तों ताज है
शाह से जा कर कोई कह दे कलंदर आ गया
— Rahat Indori















