नियाज़-ए-इश्क़ से नाज़-ए-बुताँ तक बात जा पहुँची

ज़मीं का तज़्किरा था आसमाँ तक बात जा पहुँची

मोहब्बत में कहीं इक राज़-दाँ तक बात जा पहुँची
बस अब क्या था ज़माने की ज़बाँ तक बात जा पहुँची

ज़माना ताड़ लेगा मैं न कहता था ये अब समझे
मुझे दीवाना कहने से कहाँ तक बात जा पहुँची

निज़ाम-ए-मयकदा पर तब्सिरे और होश वालों में
यहीं से अज़्मत-ए-पीर-ए-मुग़ाँ तक बात जा पहुँची

सुना ये था कि चश्मक बिजलियों को है बहारों से
हुआ ये है कि मेरे आशियाँ तक बात जा पहुँची

रह-ए-मंज़िल में ऐ रह रह के हिम्मत हारने वाले
ख़बर भी है कि मीर-ए-कारवाँ तक बात जा पहुँची

— Raees Rampuri

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Ummeed Shayari

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