जैसे कोई रब्त नहीं हो जैसे हों अनजाने लोग

क्या से क्या हो जाते हैं अक्सर जाने-पहचाने लोग

मुँह से बात निकलते ही सौ गढ़ लेंगे अफ़्साने लोग
बैठे-बैठे बुन लेते हैं कैसे ताने-बाने लोग

दैर-ओ-हरम ही से दुनिया को होश की राहें मिलती हैं
दैर-ओ-हरम के नाम पे ही बन जाते हैं दीवाने लोग

कोई उन्हें भी तो समझाए कोई कुछ उन से भी कहे
जब देखो तब आ जाते हैं मुझ को ही समझाने लोग

हज़रत-ए-ज़ाहिद समझा दें तो तौबा कर लूँ मैं भी 'रईस'
बादल क्यूँ छा जाते हैं जब जाते हैं मयख़ाने लोग

— Raees Rampuri

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