जाते नहीं हैं शौक़ से मैख़ाने आदमी

दर्दों से जूझते हैं ये दीवाने आदमी

तारीफ़-ए-इश्क़ में जो कहे चार शब्द तो
अंजाम-ए-इश्क़ हैं लगे समझाने आदमी

जाने ये कौन रिश्ता है आता नहीं समझ
मय्यत पे मेरी रोते हैं अनजाने आदमी

मोबाइल आज कल सभी की जान बन गया
जाए न फोन के बिना पैख़ाने आदमी

अफ़सोस है मुझे मेरे अपनों की ओर से
धमकाने मुझ को आए हैं बेगाने आदमी

— Raaz Gurjar

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