लहू में डूबा हुआ पैरहन चमकता है
सुलगती रेत पर इक गुल-बदन चमकता है
सितारे बुझते चले जा रहे हैं ख़ेमों में
बस इक चराग़ सर-ए-अंजुमन चमकता है
ज़ईफ़ चुन तो रहा है जवान लाशों को
मगर निगाह में इक बाँकपन चमकता है
ये कैसे फूल झड़े शीर-ख़ार होंटों से
कि जिन के नूर से सारा चमन चमकता है
ये कौन माह-ए-मुनव्वर असीर है 'शहज़ाद'
ये किस का हल्क़ा-ए-तौक़-ओ-रसन चमकता है
— Qamar Raza Shahzad















