अलम-ब-दस्त कहीं आइना-ब-कफ़ हूँ मैं
तिरे ख़िलाफ़ हर इक सम्त सफ़-ब-सफ़ हूँ मैं
मुझे तलाश न कर तू कि इक ज़माना हुआ
किताब-ए-इश्क़ के हर बाब से हज़फ़ हूँ मैं
हज़ार भेस बदलता रहूँ मगर इस पार
किसी चमकती हुई आँख का हदफ़ हूँ मैं
बदलता रहता हूँ हर लम्हा अपने ख़द-ओ-ख़ाल
कहीं गुहर कहीं दरिया कहीं सदफ़ हूँ मैं
डटा हुआ हूँ अभी तक महाज़ पर 'शहज़ाद'
अगरचे हारे हुए शाह की तरफ़ हूँ मैं
— Qamar Raza Shahzad















