साया नहीं है दूर तक साए में आएँ किस तरह

हम आ गए हैं किस तरफ़ तुम को बताएँ किस तरह

ये फूल पत्ते चाँदनी ये सूरतें मन-मोहनी
ऐसे में अपनी जांकनी उन से छुपाएँ किस तरह

आलम बहाराँ का सही मंज़र गुलिस्ताँ का सही
बस्ती बयाबाँ की सही दामन बचाएँ किस तरह

जिस फूल की हर पंखुड़ी होती है मोती की लड़ी
उस फूल की ख़ातिर कभी आँसू बहाएँ किस तरह

— Qamar Jameel

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Gulshan Shayari

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